क्षत्रिय यदुकुलोत्पन्न स्वराज्यस्वप्नदर्शक श्रीमंत महाराज लखुजीराजे जाधवराव.

क्षत्रिय यदुकुलोत्पन्न स्वराज्यस्वप्नदर्शक
श्रीमंत महाराज लखुजीराजे जाधवराव.

रणमस्तबहाद्दर

लखुजीराजे यह व्यक्ती महाराष्ट्र के इतिहास का अविभाज्य अंग हैं | परकीय रियासतोंके अत्याचारोंसे कुचले हुवे महाराष्ट्र भूमीकों स्वराज्य की प्रेरणा देणेवाले वीर के रुप में लखुजीराजेकों देखा जाता है | उनका संपूर्ण जीवन अपने लोगोंको एकजूट कर स्वराज्य की निव रखने में व्यतीत हुवा |



          भारत के गौरवशाली साम्राजोमें देवगिरी के यादव साम्राज्य का स्थान हमेशा ही ऊँचा रहा है | इसी साम्राज्य के आखरी सम्राट शंकरदेवराय यादवजीको अल्लाउद्दीन खिलजीके गुलाम मलिक कफुरने छलसे हराया और देवगिरी की सत्ता हस्तगत कर ली | राजा रामदेवराय की मौत तो पहलेही इ.स. १३१० में हो चूकी थी और इस युद्ध में इ.स. १३१२ को राजा शंकरदेवराय को भी वीरगती प्राप्त हुयी | सम्राट रामदेवराय के जमाता राजा हरपालदेवनें खिलजी कें खिलाफ उठाव कियाँ किंतू उनकी बढेही निर्घृणतासें कफूर द्वारा हत्या कर दी गयी | सम्राट शंकरदेवराय के बेटे गोविंददेव जाधवजीने अनेको बार अपना राज्य फिरसे हासिल करने की कोशिश की | दुर्भाग्यसे उन्हे स्थानिक राजा और सरदारोंकी साथ नहीं मिल पायी | फिर भी इ.स. १३३६ मे गोविंददेवजीने हतनुर (खानदेश) में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की (मकुइ भाग -१)| लेकीन उनकी ये योजना सफल नहीं हुयी | इ.स. १३४७ मे अन्य हिंदू राजा और हसन गंगू के साथ मिल उन्होंने बहमनी राज्य की स्थापना की | कुछ ही दिनोंमे हसन के नापाक मनसुबे जान उन्होंने फिरसे उसके खिलाफ बगावत की |

                 स्वातंत्र्य की विरासत संजोगे हुये इसी खानदान में विठ्ठलदेव तथा विठोजी जाधवराव और ठाकराई राणीसरकार कें घर लक्ष्मणदेव तथा लखुजीराव राजे साहब का जन्म हुवा | लखुजी राजेसाहब के गोविंददेव बाद आये पुर्खोनें स्वतंत्रता की ज्वाला सिने में रख घराणेंकी प्रतिष्ठा, आर्थिक और सामाजिक स्थेर्य बढानेंकी कोशिश की | इ.स. १५६० में लखुजीराजे को उनकी खानदानी जागीर, देशमुखी और पंचहजारी मनसब निजामशाह ने उन्हे बहाल की | इस दौराण जाधवराव परीवार उनके मेहकर सरकार के पैठण परगणेमें लासनेर नामकी राजधानी में रहता था (राजेजाधवरावांची बखर पृ.२) | मुळे घराणेंके पारंपरिक सिंदखेड परगणे के देशमुखी वतनपर रविराव ढोणे नामक उन्हीके सेवक ने कब्जा कर लिया था | यमुनाबाई मुळे की बिनती पर अपने भाई भूतजी तथा जगदेवराव को साथ लेकर लखुजीराजेने सिंदखेड परगणा रविराव से मुक्त किया | इससे खुश होकर यमुनाबाई ने फसली सन ९८५ अर्थात इ.स. १५७६ को सिंदखेड की देशमुखी लखुजीराजे के नाम लिख दी |



                 "या वेळेपासून राजे जाधवराव राहू लागले सिंदखेडला - महाल केले - बांधले न्याय दरबार - रंगमहाल म्हंती त्याला. तेव्हापासून सिंदखेडराजा म्हणू लागले गावाला, न्याय चाले - वैभव आले गावाला, चाळीस हजार लोक वस्तीला, शिवाय दहा हजार लष्कर राहु लागले गावाला.." इस तरह के भाट कवनोंमे (कविताओंमे) लखुजीराजे के सिंदखेडराजा आने के बाद की हकीकत बतायी गयी है | अपने कर्तृत्व के दम पर उन्होने निजामशाह से १० हजारी मनसब, अठ्ठाईस महाल और बावन चावडी की मनसब वंशपरंपरागत रुप में अपने नाम करवाई | तबसे निजामशाही दरबार में लखुजीराजेकी प्रतिष्ठा बढनें लगी और वो इतनी बढी की वह निजामशाही दरबार के दक्षिणी गुट के सबसे प्रभावी नेता बने | किसी भी हिंदू सरदार को न दियी जाने वाली बर्गीय और नाईकवाडी पैदल सेना के नेतृत्व की जिम्मेदारी उनपर दी जाने लगी ऐसा उल्लेख फिरिस्ता और सय्यद‌अली के फारसी ग्रंथोमे मिलता है | लखुजीराजे साहब ने अनेको मराठा वीरोंको पातशाही सेवा में दाखिल करवाया | इसके पिछे मराठोंकी आर्थिक और सामाजिक स्थिती सुधारणा यही उनकी मनशा थी |

                 लखुजीराजे को म्हाळसाबाई तथा गिरीजाबाई, यमुनाबाई और भागिरथीबाई ऐसी तीन स्त्रियां थी | उनमेंसे म्हाळसाबाई से उन्हे दत्ताजीराजे, अचलोजीराजे, राघोजीराजे, बहादूरजीराजे ये चार पुत्र और जिजाऊ ये कन्या प्राप्त हुयी | म्हालसाबाई फलटणके वनगोजी नाईक निंबालकर की बहन थी | लखुजीराजे के समय में जाधवराव यह भारतवर्ष के सभी मराठा घराणोंमे अव्वल दर्जा का घराणा था | उन्होंने अपने बेटोंके साथ बेटीको भी न्याय, शास्त्र, शस्त्र, युद्ध, धर्म, राज्यकारभार और स्वतंत्रता की शिक्षा दी |

                अपने खानदान को स्थिरता प्राप्त करवाने के बाद उन्होंने निजामशाह के खिलाफ बंड करना शुरु किया | १६०५ में जहांगीर दिल्ली के गद्दीपर आया | निजाम और मुघलोंके पेहले दो युद्धोमें लखुजीराजे ने निजामशाह का साथ दिया और जीत हासिल कर ली लेकीन १६१५ में लखुजी मुघलोंको जा मिले | परिणामतः तिसरे युद्ध में निजामशाही कि हार हुयी | १८ नव्हम्बर १६२० के अंग्रेजोके पत्र (संदेश) के अनुसार 'शहजादा और देड साल इधरही (दख्खनमें) रहेगा. दख्खनका एक बडा सेनापती जदुराय (जाधवराव) उसके (मलिक अंबरके) गुट से फुंटकर ३० अक्टूबर से पहले शहजादे को जा मिला | उसका (जाधवराव का) बहुत बडा सम्मान किया गया |' अपने पिता बादशहा जहांगीर के खिलाफ शहजादा खुर्रम तथा शहाजहानने किये उठाव को लखुजीराजे ने समर्थन दिया | धिरेधिरे सभी दखनी सत्ताओंने खुर्रम को समर्थन दर्शाया | इसी दौरान दौलताबाद दरबार में कुप्रसिद्ध खंडागले हाथी घटना घटी |

                   १६२३ में मुघलोके खिलाफ बहोत बडा दरबार भरा | दरबार समाप्ती पर सरदार खंडागले का हाथी बिथर गया और सेना को कुचलने लगा | अपने सेना को बचाने के लिये राजे दत्ताजीराव मदोन्मत्त हाथी से लढने लगे | अपने हाथी को बचाने हेतू खंडागले तथापि शहाजीबंधू खेलोजी और संभाजी दत्ताजी को रोकने लगे | अपने अतुलनीय पराक्रमसे दत्ताजीराजेने अकेलेही हाथी को मार गिराया | तभी संभाजीने दत्ताजीराजेपर हमला किया, जिसमे उनकी मौत हो गयी | ये बात जब लखुजीराजे को समझी तब उन्होंने प्रकोप मे संभाजी का सर धडसे अलग किया | इसी हाथापाई में जमाता शहाजीराजे भी लखुजीराजे के हाथो जखमी हुये | जाधव - भोसले समदीयोंके बीच उत्पन्न हुयी ये एकमेव विवाद की घटना थी |

                  खंडागले प्रकरण के तुरन्त बाद लखुजीराजे पुर्णतः निईजामशाही के खिलाफ चले गये | दख्खन का मातब्बर और होनहार सरदार असंतुष्ट हो मुघलोको आ मिलने कि खुशी में शहजादे को भी न मिल्नेवाली २४००० कि मनसब और १५००० घुडसवारोंका अधिकार देकर मुघलोने लखुजीराजे का सम्मान किया | १६२४ में भातवडी के युद्ध में अपनेही जमाई से ना लढना पडे इसलिये वे युद्धभूमी हे पिछे हटे (शिवभारत) | अपने राज्यधुरंधर बुद्धीमत्ता से उन्होंने हमेशा ही सारी पातशाहीयोंको आपस में उलझायें और लढायें रखा | उनकी आपसी रंजिशोकां फायदा उठा अनेको मराठा वीरोको अपनी समशेर चमकाने का मौका दियाँ |

                  १६२९ में, शाहजीराजे ने लखूजीराजे को निजामशाही लौटने के लिए राजी किया और दौलताबाद जाने का फैसला किया। लेकिन २५ जुलाई १६२९ को, पूर्व निर्धारित साजिश के अनुसार, निज़ाम ने देवगिरी में लखुजीराजे के पूर्वजों के ही दरबार में लखूजी राजे, उनके दो बेटों और पोते यशवंतराव राजे को धोखे से मार डाला और अपने काल को आमंत्रित किया, क्योंकि १६३३ में मुगलों ने दौलताबाद पर विजय प्राप्त की। पती के हत्या की खबर से रणरागिनी महारानी म्हालसबाई, जो किले के तलहटी पर थीं, वो जरा भी डगमगाई नहीं। वे अपनी सेना के साथ किले पर हमला कर अपने पती, बेटे और पोते का पार्थिव वहा से सिंदखेडराजा ले आयी | और उनपर शाही इतमामसे दाह संस्कार किया | लखुजीराजे के भाई जगदेवराव ने सिंदखेडराजा में उनकी दुनिया की सबसे बडी हिंदू राजा की समाधी बनायी |



            उस समय के दस्तावेजों में यह उल्लेख किया गया है कि सिंदखेडकर राजे जाधवराव की महिलाओं ने अनेको बार जहाँगीरी की कमान संभाली, न्याय दिलाया, दान के पत्र दिए और हाथ में तलवार लेकर दुश्मन का भी सामना किया। साथ ही, सुसंस्कृत जाधवराव के संरक्षण में, पंडित-पुरोहित, भाट और गोसाविनंद जैसे कई महान कवि थे। इसके बाद के वंशजों ने अपने शक्तिशाली राजवंश और लखूजी राजे की प्रतिष्ठा को बनाए रखने और बढ़ाने की कोशिश की। स्वराज्य के सरसेनापती धनजीराव, सरदार रायाजीराव राजे, राजे शंभूसिंह, राजे पतंगराव, सेनापती पिलाजीराव, राजे रावजगदेवराव, रामचंद्र उर्फ ​​बाबाजी, राघोजी आदि पुरुष और म्हालसबाई, जीजाऊ, दुर्गाबाई, अम्बिकाबाई, निहाल कुँवरबाई, रणुबाई आदि महिलायें इसका मुर्तीमंत उदाहरण है | इस लिये मल्हारराव होल्कर की "जाधवराव, आप मराठों की काशी है" यह प्रशंसा सार्थक है।

             इ.स. १६३३ से १६३५ तक, शिवराय और जिजाऊ सिंदखेडराजा में रहे। भाट ने इस संबंध में राव जगदेवराव के पत्र का सुंदर वर्णन किया है। यदु वंश की स्वतंत्रता की महान विरासत है। ११८७ में, पांचवें भिल्लम ने देवगिरी में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की और लखूजी राजे के स्वअस्तित्व के प्रयासों के संस्कार बाल शिवबा पे करने के लिए ३ से ५ साल की उम्र में माँ जिजाऊ शिवराय के साथ सिंदखेडराजा में थी। जिजाऊ पर पडी लखुजी राजे की छाप और संस्कारों को देखते हुए,  "स्वराज्यस्वप्नदर्शक" ये उनका शीर्षक सार्थक है।

 मनुष्य योनी धन्य झालो,
वीर जाधवराव कुळी जन्मलो !!
#रणमस्तबहाद्दर 
                                 ✍️ स्वप्नील महेंद्र जाधवराव.

शबहि ए जादून राय दखनी 
(दख्खनचे सम्राट श्रीमंत जाधवराव)




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